@संपादकीय सवाल निजी स्कूल बंद करने का नहीं, सरकारी स्कूलों को इतना मजबूत बनाने का है कि वे पहली पसंद बनें. कल्पना कीजिए कि छत्तीसगढ़ के सभी निजी स्कूल अचानक बंद कर दिए जाएँ और प्रदेश के हर बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी सरकारी स्कूलों पर आ जाए। लाखों बच्चों को सरकारी स्कूलों में प्रवेश देना होगा, नए स्कूल खोलने होंगे, अतिरिक्त शिक्षक नियुक्त करने होंगे और मौजूदा स्कूलों की सुविधाओं का विस्तार करना होगा। यह निश्चित रूप से सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। लेकिन इसी काल्पनिक सवाल के भीतर एक वास्तविक और महत्वपूर्ण सवाल छिपा है—आखिर सरकारी स्कूलों को इतना मजबूत क्यों नहीं बनाया जा सकता कि अभिभावक अपने बच्चों को वहाँ पढ़ाना मजबूरी नहीं, बल्कि गर्व समझें?
आज बहस का मुद्दा यह नहीं होना चाहिए कि निजी स्कूल बंद हों या नहीं। असली मुद्दा यह होना चाहिए कि सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता कैसे इतनी बेहतर बनाई जाए कि वे निजी स्कूलों के सामने एक मजबूत विकल्प बन सकें। सरकारी स्कूल केवल गरीब परिवारों के बच्चों के लिए नहीं हैं। वे प्रदेश की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि यही व्यवस्था मजबूत होगी तो इसका लाभ समाज के हर वर्ग को मिलेगा।
छत्तीसगढ़ में स्कूलों की वर्तमान स्थिति (UDISE+ 2024-25 और आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े)
राज्य में कुल लगभग 56,800 से 56,900 स्कूल हैं। इनमें से:
प्राथमिक स्कूल: लगभग 32,380–32,386
उच्च प्राथमिक (मध्य/मिडिल) स्कूल: लगभग 16,687
माध्यमिक (सेकेंडरी) स्कूल: लगभग 2,703–2,705
उच्चतर माध्यमिक (हायर सेकेंडरी) स्कूल: लगभग 5,032
सरकारी स्कूलों में नामांकन का हिस्सा कक्षा 1–12 में लगभग 70.8% है, जबकि निजी अनएडेड स्कूलों में लगभग 27–28% बच्चे पढ़ते हैं। निजी स्कूलों की संख्या 2023-24 में लगभग 7,000–7,150 के आसपास रही है। कुल छात्र संख्या लगभग 58 लाख और शिक्षकों की संख्या लगभग 2.8 लाख के आसपास है।
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि सरकारी स्कूल अभी भी बहुसंख्यक बच्चों की शिक्षा का मुख्य आधार हैं। लेकिन वास्तविकता यह भी है कि कई सरकारी स्कूलों की हालत चिंताजनक बनी हुई है।
सरकारी स्कूलों की बदहाली की तस्वीर
हाल के वर्षों में कई रिपोर्ट्स और समाचार सामने आए हैं जो व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करते हैं:
- 2025 में शिक्षा विभाग ने स्वीकार किया कि राज्य के लगभग 8,106 सरकारी स्कूल भवन जर्जर अवस्था में हैं। इनमें से 3,789 अत्यंत खराब और खतरनाक हालत में बताए गए। कई स्कूलों में दीवारें टूटी-फूटी हैं, छत से पानी टपकता है और फर्श फिसलन भरा है।
- बस्तर संभाग के सात जिलों में ही 1,400 से अधिक स्कूल जर्जर पाए गए। कुछ जगहों पर बारिश के मौसम में स्कूल बंद करने पड़ते हैं क्योंकि भवन सुरक्षित नहीं रहते।
- पहले सैकड़ों स्कूल शिक्षक-विहीन थे और हजारों में सिर्फ एक शिक्षक था। युक्तियुक्तकरण के बाद शिक्षक-विहीन स्कूल समाप्त हो गए और एकल-शिक्षक स्कूलों की संख्या में 80% तक कमी आई, लेकिन अभी भी कुछ दूरस्थ क्षेत्रों में एकल-शिक्षक प्राथमिक स्कूल मौजूद हैं।
- कई जगहों पर विषयवार शिक्षक, प्रयोगशाला, पुस्तकालय और खेल सुविधाओं की कमी बनी हुई है। गुणवत्ता के मामले में भी चुनौतियाँ हैं—माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है।
ये खबरें बार-बार याद दिलाती हैं कि सिर्फ स्कूल खोलना काफी नहीं है। बच्चों को सुरक्षित भवन, पर्याप्त शिक्षक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए।
छत्तीसगढ़ में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। गाँवों, कस्बों और दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में ऐसे बच्चे हैं जिनमें विज्ञान, गणित, खेल, साहित्य, कला, तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में आगे बढ़ने की क्षमता है। लेकिन प्रतिभा को सफलता में बदलने के लिए अच्छे शिक्षक, संसाधन, मार्गदर्शन और अवसर चाहिए। सरकार यदि सरकारी स्कूलों को प्रतिभा विकास का केंद्र बनाए, तो प्रदेश के हजारों बच्चों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया जा सकता है। हर जिले और विकासखंड में प्रतिभा खोज कार्यक्रम, विज्ञान एवं गणित प्रतियोगिताएँ, खेल प्रशिक्षण, कला और तकनीकी गतिविधियाँ तथा विशेषज्ञों का मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा सकता है।
इसके लिए सरकार को जहाँ आवश्यकता है वहाँ नए सरकारी स्कूल खोलने होंगे और मौजूदा स्कूलों में पर्याप्त विषयवार शिक्षक उपलब्ध कराने होंगे। स्कूलों में विज्ञान और कंप्यूटर प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय, खेल सुविधाएँ, स्वच्छ पेयजल, शौचालय और आधुनिक शिक्षण संसाधन सुनिश्चित करने होंगे। विशेष ध्यान ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों पर देना होगा, ताकि किसी बच्चे का भविष्य केवल इसलिए सीमित न हो जाए कि वह प्रदेश के किसी छोटे गाँव या आदिवासी क्षेत्र में पैदा हुआ है।
निजी स्कूलों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार जरूरी
साथ ही निजी स्कूलों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार जरूरी है। निजी स्कूलों का होना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन शिक्षा के नाम पर मनमानी फीस और अनावश्यक शुल्क अभिभावकों के लिए बड़ी परेशानी बन सकते हैं। सरकार को निजी स्कूलों की फीस व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। फीस में वृद्धि के स्पष्ट नियम हों, प्रत्येक शुल्क की जानकारी अभिभावकों को दी जाए और नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई हो। शिकायतों के समाधान के लिए सरल और समयबद्ध व्यवस्था भी बनाई जानी चाहिए।
सरकारी स्कूलों को मजबूत करना निजी स्कूलों के खिलाफ अभियान नहीं है। वास्तव में मजबूत सरकारी स्कूल अभिभावकों को एक भरोसेमंद विकल्प देते हैं। जब सरकारी स्कूल बेहतर होंगे तो निजी स्कूलों को भी गुणवत्ता और पारदर्शिता बनाए रखने का दबाव रहेगा। तब निजी स्कूल का चुनाव मजबूरी नहीं, बल्कि अभिभावक की पसंद होगा।
छत्तीसगढ़ सरकार को अब शिक्षा को केवल बजट की एक मद के रूप में नहीं, बल्कि प्रदेश के भविष्य में निवेश के रूप में देखना होगा। नए स्कूल खोलने, शिक्षकों की कमी दूर करने, आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने और प्रतिभाशाली बच्चों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाने की ठोस योजना बनानी होगी। साथ ही निजी स्कूलों की फीस की मनमानी पर प्रभावी नियंत्रण भी जरूरी है।
आखिरकार सवाल यह नहीं है कि छत्तीसगढ़ के सारे निजी स्कूल बंद कर दिए जाएँ। सवाल यह है कि क्या हमारे सरकारी स्कूल इतने अच्छे हो सकते हैं कि हर अभिभावक कहे—"मेरे बच्चे के लिए इससे बेहतर विकल्प क्या हो सकता है?"
यदि सरकार इस दिशा में गंभीरता से काम करती है, तो आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की पहचान केवल अपनी प्राकृतिक संपदा से नहीं, बल्कि उन प्रतिभाशाली बच्चों से भी होगी जो सरकारी स्कूलों से निकलकर देश और दुनिया में प्रदेश का नाम रोशन करेंगे।
सरकारी स्कूल मजबूत होंगे, तो शिक्षा मजबूत होगी; शिक्षा मजबूत होगी, तो छत्तीसगढ़ का भविष्य मजबूत होगा।
नोट:- स्कूल संख्या और नामांकन के आंकड़े मुख्य रूप से UDISE+ 2024-25 और छत्तीसगढ़ आर्थिक सर्वेक्षण पर आधारित हैं। जर्जर भवनों और शिक्षक संबंधी आंकड़े 2025 की सरकारी और समाचार रिपोर्ट्स से लिए गए हैं।

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