@संपादकीय: हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस आता है। नेता पौधे लगाते हैं, अधिकारी फोटो खिंचवाते हैं, संस्थाएँ सेमिनार करती हैं और सोशल मीडिया पर लोग हरे-भरे पोस्टर साझा करते हैं। अगले दिन वही पेड़ सूखने के लिए छोड़ दिए जाते हैं और वही मशीनें जंगल काटने निकल पड़ती हैं।
सवाल यह है कि क्या पर्यावरण दिवस मनाने से पर्यावरण बच जाएगा? जिस देश में नदियों को नाला बना दिया गया हो, तालाबों को पाटकर कॉलोनियाँ खड़ी की जा रही हों, पहाड़ों को काटकर खनन किया जा रहा हो और जंगलों को Development Project के नाम पर खत्म किया जा रहा हो, वहाँ पर्यावरण दिवस एक उत्सव कम और मज़ाक ज़्यादा लगता है। आज हालत यह है कि शहरों में कंक्रीट के जंगल तेजी से बढ़ रहे हैं। जहाँ कभी खेत थे वहाँ शहर और कस्बे हैं, जहाँ तालाब थे वहाँ मॉल खड़े हैं और जहाँ जंगल थे वहाँ खदानें चल रही हैं। सरकारें GDP और Growth Rate के आंकड़े दिखाकर इसे विकास बताती हैं, लेकिन कोई यह नहीं बताता कि इस विकास की कीमत कौन चुका रहा है। इसकी कीमत चुका रही हैं हमारी नदियाँ, हमारे जंगल, हमारी हवा और सबसे बड़ी कीमत आने वाली पीढ़ियाँ चुकाएँगी।
देश की सैकड़ों नदियाँ प्रदूषण से जूझ रही हैं। उद्योगों का खतरनाक केमिकल, शहरों का सीवर और विकास के नाम पर किए गए अतिक्रमण नदियों का गला घोंट रहे हैं। कई छोटी बरसाती नदियाँ नक्शों में तो हैं, जमीन पर नहीं। हजारों तालाब या तो सूख चुके हैं या उन पर कब्ज़ा हो चुका है। बरसात का पानी जमीन में जाने की जगह सीधे बहकर बाढ़ बन जाता है और फिर गर्मी में वही इलाका पानी के लिए तरसता है। विडंबना देखिए कि सरकारें एक तरफ जल संरक्षण अभियान चलाती हैं और दूसरी तरफ उन परियोजनाओं को मंजूरी देती हैं जो प्राकृतिक जल स्रोतों को ही खत्म कर देती हैं। हर साल लाखों नई गाड़ियाँ सड़कों पर उतर रही हैं। Public Transport को मजबूत करने की बजाय निजी वाहनों को बढ़ावा मिल रहा है। शहरों में AC अब जरूरत से ज्यादा स्टेटस सिंबल बन चुका है। AC घर के अंदर ठंडक देता है लेकिन बाहर की गर्मी और बढ़ा देता है। करोड़ों AC और करोड़ों वाहन मिलकर वातावरण में ऐसा दबाव बना रहे हैं कि शहर लगातार Heat Island में बदलते जा रहे हैं। फिर भी हमें बताया जाता है कि सब कुछ सामान्य है। क्या यह सामान्य है कि मई-जून में तापमान 45 से 50 डिग्री तक पहुँच जाए? क्या यह सामान्य है कि हर साल नए इलाके सूखे और बाढ़ दोनों की मार झेलें? क्या यह सामान्य है कि बच्चों को साफ हवा और साफ पानी भी नसीब न हो? असल समस्या नागरिक नहीं हैं। समस्या वह विकास मॉडल है जिसमें पेड़ बाधा हैं, नदियाँ संसाधन हैं और पहाड़ सिर्फ खनिज का भंडार हैं। सरकारें अक्सर जनता से कहती हैं कि प्लास्टिक मत फेंको, पानी बचाओ, पेड़ लगाओ। यह सही बात है। लेकिन क्या सरकारें खुद अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं? एक नागरिक दस या बीस पेड़ लगा सकता है, लेकिन एक सरकारी अनुमति हजारों पेड़ एक झटके में कटवा सकती है। एक परिवार पानी बचा सकता है, लेकिन एक गलत परियोजना पूरे जलग्रहण क्षेत्र को बर्बाद कर सकती है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण की असली परीक्षा नागरिकों से पहले सरकारों की है। पर्यावरण भाषणों से नहीं बचता, पर्यावरण सेल्फी से नहीं बचता,पर्यावरण एक दिन के कार्यक्रमों से नहीं बचता। पर्यावरण बचता है राजनीतिक इच्छाशक्ति से, ईमानदार नीतियों से और ऐसे विकास मॉडल से जिसमें प्रकृति को दुश्मन नहीं, साझेदार माना जाए। यदि विकास का मतलब नदियों की मौत, जंगलों की कटाई, जहरीली हवा और सूखती धरती है, तो हमें रुककर पूछना चाहिए। क्या हम सचमुच विकसित हो रहे हैं, या केवल अपने विनाश को आधुनिक नाम दे रहे हैं? क्योंकि खतरा जनता की लापरवाही से कम और प्रकृति-विरोधी नीतियों से कहीं अधिक है।

