@संपादकीय: छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। केंद्र सरकार की वन सलाहकार समिति द्वारा केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को स्टेज-1 वन स्वीकृति दिए जाने के बाद यह सवाल और तीखा हो गया है कि क्या देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए हम अपने सबसे संवेदनशील जंगलों की बलि देने को तैयार हैं?

सरगुजा जिले में फैला हसदेव अरण्य केवल एक जंगल नहीं, बल्कि मध्य भारत की पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण आधार है। लगभग 1.7 लाख हेक्टेयर में फैला यह क्षेत्र हसदेव नदी का जलग्रहण क्षेत्र है और हाथियों सहित अनेक वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी। यही कारण है कि विशेषज्ञ लंबे समय से इसे “नो-गो ज़ोन” मानने की मांग करते रहे हैं। इसके बावजूद अब यहां तीसरी बड़ी कोयला खदान को मंजूरी मिलने से विवाद गहरा गया है।

केंते एक्सटेंशन परियोजना के लिए 1,742 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि डायवर्ट की जाएगी। सरकारी आकलनों के अनुसार लाखों पेड़ों की कटाई होगी। यह वही इलाका है जिसे सरकारी Decision Support System में “हाई कंजर्वेशन जोन” के रूप में चिह्नित किया गया है। सवाल यह है कि यदि उच्च संरक्षण वाले क्षेत्र भी खनन से सुरक्षित नहीं हैं, तो फिर संरक्षण की अवधारणा का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है?

सरकार का तर्क है कि राजस्थान की बढ़ती बिजली जरूरतों के लिए कोयला आवश्यक है। प्रस्तावित खदान से निकलने वाला कोयला छबड़ा और सूरतगढ़ ताप विद्युत संयंत्रों को आपूर्ति करेगा। साथ ही, क्षतिपूरक वनीकरण और चरणबद्ध खनन का आश्वासन भी दिया गया है। लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि सदियों पुराने प्राकृतिक जंगलों की भरपाई कृत्रिम पौधारोपण से संभव नहीं है। जैव-विविधता, जल स्रोत और पारंपरिक जीवन पद्धति का नुकसान स्थायी हो सकता है।

इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पक्ष आदिवासी समुदायों का है। हसदेव क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी जंगल को केवल संसाधन नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, आजीविका और पहचान का हिस्सा मानते हैं। ऐसे में खनन परियोजनाओं को लेकर उनका विरोध केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न भी है। पेसा और वनाधिकार कानूनों के पालन को लेकर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं।

दरअसल, हसदेव का विवाद केवल एक खदान तक सीमित नहीं है। यह उस विकास मॉडल पर प्रश्नचिह्न है जिसमें आर्थिक वृद्धि और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पर्यावरणीय संतुलन तथा स्थानीय समुदायों के अधिकार अक्सर पीछे छूट जाते हैं। भारत जैसे देश के लिए ऊर्जा उत्पादन जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि विकास की दिशा टिकाऊ और न्यायपूर्ण हो।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, उद्योग और स्थानीय समुदायों के बीच पारदर्शी संवाद हो। केवल प्रशासनिक मंजूरी पर्याप्त नहीं हो सकती। यदि पर्यावरणीय प्रभाव, आदिवासी अधिकार और जलवायु संकट जैसे मुद्दों को नजरअंदाज किया गया, तो हसदेव अरण्य आने वाले वर्षों में केवल एक जंगल नहीं, बल्कि विकास और विनाश के बीच संघर्ष का प्रतीक बन जाएगा।

हसदेव का भविष्य अब केवल छत्तीसगढ़ का मुद्दा नहीं रहा; यह देश की पर्यावरणीय नीतियों और विकास की प्राथमिकताओं की परीक्षा बन चुका है।