@संपादकीय:
“जिस धरती पर हम चलते हैं, वो किसी मज़दूर के फावड़े से समतल हुई है।
जिस इमारत में हम रहते हैं, वो किसी मज़दूर के हथौड़े की गूंज है!”
भारत की चमकदार तस्वीर के पीछे अगर किसी वर्ग का सबसे अधिक श्रम छिपा है, तो वह मजदूर वर्ग है। वही मजदूर जो शहरों की ऊँची इमारतें खड़ी करता है, वही मजदुर जो सड़कों को आकार देता है, वही मजदुर जो फैक्ट्रियों को चलाता है, वही मजदुर जो मेट्रो लाइनें बिछाता है, वही मजदुर जो हमारे कचरे और गटर को साफ करता है और अब डिजिटल अर्थव्यवस्था के दौर में 10 मिनट डिलीवरी, कैब सेवा, वेयरहाउस और ई-कॉमर्स की रीढ़ बन चुका है। लेकिन विडंबना यह है कि विकास का यह सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति स्वयं असुरक्षा, अभाव और असम्मान से भरा जीवन जीने को मजबूर है। जबकि उनके लिए संवैधानिक तौर श्रमिक कानून बने हैं। लेकिन सिर्फ कागजों पर। दुर्घटना में मरते हुये वह सिर्फ नंबर होते हैं व्यक्ति नहीं। चमकदार शहरों को चमकाने वाले खुद अंधेरे में रहते हैं। देश में बढ़ती गर्मी ने मजदूरों की त्रासदी को और अधिक भयावह बना दिया है। दुनिया के पैमाने पर भारत के तमाम शहर आग की भट्टी बन चुके हैं। लेकिन यह मजदुर बिना रुके इन्हीं स्थितियों में मजबूरीवश काम करने को मजबूर होते हैं। निर्माण स्थलों से लेकर, सड़क परियोजनाओं, औद्योगिक क्षेत्रों और कृषि में काम करने वाले लाखों मजदूर बिना पर्याप्त छाया, स्वच्छ पेयजल, शौचालय और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा के काम करते हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) 2019 की रिपोर्ट जिसका शीर्षक ‘वर्किंग ऑन ए वार्मर प्लैनेट - द इम्पैक्ट ऑफ हीट स्ट्रेस ऑन लेबर प्रोडक्टिविटी एंड डिसेंट वर्क’ बताती है कि अत्यधिक गर्मी के कारण वैश्विक स्तर पर श्रम उत्पादकता प्रभावित हो रही है, लेकिन भारत जैसे देशों में इसका सबसे बड़ा बोझ गरीब और असंगठित मजदूरों पर पड़ेगा।
भारत की कुल कार्यशील आबादी का लगभग 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है। यह लगभग 47-50 करोड़ श्रमिकों का विशाल समूह है, जिनमें निर्माण मजदूर, घरेलू कामगार, कृषि मजदूर, रिक्शा चालक, रेहड़ी-पटरी विक्रेता, फैक्ट्री वर्कर, गिग वर्कर(on-demand) और अस्थायी कर्मचारी शामिल हैं। इनके पास न स्थायी रोजगार है, न पेंशन, न बीमा, न पर्याप्त स्वास्थ्य सुरक्षा। दुर्घटना होने पर या मृत्यु की स्थिति में कुछ हजार या लाख रुपये का मुआवजा देकर व्यवस्था अपना फर्ज अदा कर देती है। मानो एक इंसान की पूरी जिंदगी की कीमत कुछ कागज के टुकड़े भर हो!
भारत में श्रमिकों के लिए कानूनों का इतिहास समृद्ध रहा है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने श्रमिक अधिकारों के लिए ऐतिहासिक योगदान दिया है। वह चाहे 8 घंटे कार्यदिवस हो, मातृत्व लाभ हो, कर्मचारी बीमा और श्रम कल्याण संबंधी कई प्रावधानों की नींव उनके प्रयासों से मजबूत हुई। लेकिन आज कॉरपोरेट पूंजी और श्रम बाजार के लचीलेपन के नाम पर इन अधिकारों को लगातार कमजोर किया जा रहा है। हाल के वर्षों में 29 श्रम कानूनों को समेटकर 4 लेबर कोड बनाए गए, जिनका उद्देश्य सरलता बताया गया, लेकिन श्रमिक संगठनों का मानना है यह सब सरकार और कार्पोरेट की सोची समझी रणनीति का नतीजा हैं। जिससे श्रमिकों की सामूहिक सौदेबाजी और सुरक्षा कमजोर हुई है। कंपनियाँ नियमों से बचने के लिए ठेका प्रथा, आउटसोर्सिंग, अस्थायी अनुबंध, अप्रेंटिसशिप और डिजिटल प्लेटफॉर्म आधारित रोजगार जैसे रास्ते निकाल रही हैं। ई-कॉमर्स और गिग इकॉनमी ने रोजगार के नए अवसर जरूर बनाए हैं, पर साथ ही नए प्रकार का असुरक्षित श्रम भी पैदा किया है। भारत में अनुमानतः 70 से 80 लाख से अधिक गिग वर्कर हैं, जिनकी संख्या 2030 तक 2 करोड़ से ऊपर पहुँचने का अनुमान है। लेकिन डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर और ऐप-आधारित कर्मियों को अक्सर कर्मचारी ही नहीं गिना जाता बल्कि उन्हें पार्टनर कहा जाता है ताकि कंपनियाँ सामाजिक सुरक्षा, बीमा और न्यूनतम वेतन जैसी जिम्मेदारियों से बच सकें। यह नए तरह के श्रम की चोरी है। उसके अलावा एक और गंभीर विडंबना यह है कि भारत में आज भी स्किल्ड और अनस्किल्ड लेबर का राष्ट्रीय लेबल पर कोई पारदर्शी डेटा उपलब्ध नहीं है। जब देश में बेरोजगारी दर युवाओं में लगातार चिंता का विषय है, तब श्रम बाजार की वास्तविक तस्वीर ही अस्पष्ट है। बिना सटीक डेटा के न नीति बनती है, न संसाधनों का समुचित वितरण संभव हो सकता है। मजदुर पूरे आर्थिक विकास का मजबूत हिस्सा होने के बावजूद भी उनके हिस्से में नाले के किनारे झुग्गी-झोपड़ी, प्रदूषित हवा, गंदा बदबूदार पानी और भयंकर अव्यवस्थित जीवन आता है। जो शहर को शहर बनाते हैं, उसी शहर में उसके लिए घर नहीं हैं। जो दूसरों के घरों में रोशनी लाते हैं, उसका अपना घर खुद अंधेरे और असुरक्षा से भरा है। किसी भी सभ्यता की नैतिकता इस बात से तय होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करती है। भारत अगर सचमुच विकसित राष्ट्र बनने का सपना देखता है, तो उसे चमकती इमारतों से पहले उन हाथों को देखना होगा, जिनकी मेहनत से यह विकास संभव हुआ है। वरना विकास की यह कहानी अधूरी ही नहीं बल्कि पूर्ण रूप से अन्यायपूर्ण ही रहेगी।

