@संपादकीय: पुस्तकों के लिए किसी एक दिन की औपचारिकता होना ही सोचनीय प्रश्न है, बावजूद इसके किताबें जिन्होंने मानव सभ्यता के उस बौद्धिक और सांस्कृतिक आधार को स्मरण करने का मौका देती आयी हैं, जिस पर ज्ञान, विचार और चेतना की पूरी इमारत खड़ी है। पुस्तकें सदियों से मनुष्य की सबसे विश्वसनीय साथी रही हैं। उन्होंने समय, समाज और अनुभवों को सहेजकर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे पहुँचाया है। वे केवल शब्दों का संग्रह नहीं रहीं  बल्कि उन्होंने अनगिनत सभ्यताओं उनसे जुड़े जीवन को सही दिशा दी है साथ ही दुनिया को एक साझा मंच पर लाने के काम के साथ विविध सभ्यताओं को समझने जानने का मौका दिया है। लेकिन आज का समय एक गहरे विरोधाभास से भरा हुआ है। एक ओर सूचनाओं का भयानक विस्फोट है, तो दूसरी ओर गहन पठन-पाठन और विचारशीलता चिंतन का अभाव। डिजिटल माध्यमों ने ज्ञान को सहज और सुलभ बनाया है, इसमें कोई संदेह नहीं, पर उसी के साथ उन्होंने हमारी पढ़ने की आदतों को सतही और अस्थिर भी कर दिया है। मोबाइल स्क्रीन पर निरंतर स्क्रॉल होती खबरें, कुछ सेकंड के वीडियो और त्वरित प्रतिक्रियाओं की संस्कृति ने हमारे धैर्य, एकाग्रता और गहन चिंतन की क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया है। और वही कारण है कि पुस्तकें हमारे जीवन से धीरे-धीरे ओझल होती जा रही हैं। पढ़ना अब एक स्वाभाविक आदत नहीं, बल्कि एक काम बन गया है। एक ऐसा काम जिसे हम समय मिलने पर करने की सोचते हैं, और वह समय अक्सर कभी आता ही नहीं। लिखना भी अब कई बार केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। विचारों की गहराई कम होती जा रही है, जबकि अभिव्यक्ति का ढाँचा अभी भी पुराने ढर्रे पर टिका हुआ है। तेज़ सूचना के इस युग में भी सार्थक यानि प्राथमिक सूचना और प्रभावी विचारों की कमी होती जा रही है। यह कमी हमें न केवल समाज से, बल्कि अपने ही भीतर के संवाद से भी दूर कर रही है। और यही कारण है कि हम संवेदना से भी दूर होते जा रहे हैं जो मनुष्यता की सबसे बड़ी निशानी है।  

किताबें केवल अक्षरों, घटनाओं, कल्पनाओं या शोध का संग्रह नहीं होतीं। वे हमारे भीतर के  अनुभवों की परतें खोलती हैं। वे हमें सोचने, समझने और महसूस करने की क्षमता प्रदान करती हैं। एक अच्छी पुस्तक हमें प्रश्नों के सामने खड़ा करती है, हमें असहज करती है, और अंततः हमें एक बेहतर मनुष्य बनने की दिशा में प्रेरित करती है। इसके विपरीत, डिजिटल सामग्री अक्सर तात्कालिक संतुष्टि तो देती है, पर स्थायी समझ का निर्माण नहीं कर पाती। कविता और साहित्य हमें बार-बार यह याद दिलाते हैं कि किताबें निर्जीव वस्तुएँ नहीं हैं। वे एक जीवंत संवाद हैं। हमारे और हमारे समय के बीच। वे हमें पुकारती हैं, हमारे भीतर उतरना चाहती हैं, हमें अपने विस्तृत संसार में ले जाना चाहती हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम उस संसार में जाना चाहते हैं? या हमने स्वयं को इतनी सीमित परिधियों में बाँध लिया है कि गहराई से जुड़ने की इच्छा ही समाप्त होती जा रही है?  बावजूद इसके तमाम डिजिटल प्लेटफ्रम जिन्होंने समय-समय पर ज्ञान का बाजारीकरण होने से मुक्ति की लड़ाई लड़ी है। ज्ञान सबके लिए सहज और समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए। कई डिजिटल मंच हैं जिन्होंने ज्ञान को मुक्त और सर्वसुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। इन प्रयासों ने यह स्थापित किया है कि ज्ञान किसी एक का स्वामित्व नहीं हो सकता। यह मानवता की साझा धरोहर है। ज्ञान कहीं बाहर से आयातित वस्तु नहीं है। वह हमारे आसपास, हमारे अनुभवों, हमारे समाज और हमारे जीवन में ही निहित है। आवश्यकता केवल उसे देखने, समझने और आत्मसात करने की दृष्टि विकसित करने की है। और इस दृष्टि के निर्माण में पुस्तकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि अंततः, जब सब कुछ बदल जाएगा, तब भी एक सच्चाई शेष रहेगी कि किताबें केवल ज्ञान नहीं देतीं, वे हमे असहज करती हैं, वह हमारे भीतर के द्वंद से लड़ने सोचने और आखिर में वे हमें मनुष्य बने रहने के लिए प्रेरित करती हैं!