@रायपुर: तथाकथित नए भारत में अक्सर यह कहा जाता है कि जाति अब अतीत की बात है। लेकिन क्या आंकड़े भी यही कहते हैं? आँकड़ों की कहानी तो कुछ और ही बयाँ करती है? या फिर यह केवल एक सुनियोजित भ्रम है, जो आधुनिकता, विकास और विश्वगुरु के झूठे व खोखले दावों के बीच असमानता की आवाज़ को दबा देने का सुनियोजित तरीका है! अगर हम आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। 2014 से 2021 के बीच अनुसूचित जातियों (SC) के खिलाफ कुल 3,65,559 मामले दर्ज हुए, यानी हर दिन औसतन 125 मामले। यह सिर्फ आँकड़े नहीं हैं, बल्कि हर दिन होने वाले अन्याय के दस्तावेज़ हैं। 2023 में यह संख्या बढ़कर 57,789 तक पहुंच गई, जो 2022 की तुलना में अधिक कष्टकारी और भयानक है। अनुसूचित जनजातियों (ST) के खिलाफ 2023 में 12,960 मामले दर्ज हुए जो पिछले वर्ष की तुलना में 28.8% अधिक हैं। अगर भारत में जाति खत्म हो गई है, तो ये आंकड़े किसकी कहानी कह रहे हैं? यह सच जरूर है कि अब छुआछूत के प्रत्यक्ष मामले नहीं दिखाई देते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जाति समाप्त हो गई है। बल्कि जाति ने अपने आपको नए रूप में ढाल लिया है जो पहले से अधिक संगठित, अधिक छिपा हुआ और अधिक प्रभावशाली तरीके से हमारे सामने है। अब यह केवल सामाजिक व्यवहार का हिस्सा नहीं, बल्कि संगठित संस्थागत ढांचे का हिस्सा बन चुकी है।

Dr. B. R. Ambedkar ने बहुत पहले कहा था कि जाति केवल श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है। आज यह कथन और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है, क्योंकि जाति अब अवसरों, संसाधनों और न्याय तक की पहुंच को बहुत मजबूती से नियंत्रित कर रही है। यदि 2023 के आँकड़ों को देखा जाए तो कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में दो-तिहाई मामले केंद्रित हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में 15,130 मामले दर्ज हुए। यह महज संयोग नहीं, बल्कि उस सामाजिक ढांचे का परिणाम है जहां जाति आज भी सत्ता, संसाधन और सामाजिक संबंधों का निर्धारण करती है और यह समस्या केवल अपराधों की संख्या तक सीमित नहीं है। बल्कि न्याय प्रणाली की स्थिति भी उतनी ही चिंताजनक है। 81.2% दर्ज मामलों में न्याय के आँकड़े सिर्फ 20-30 प्रतिशत ही हैं। यानी अधिकतर मामलों में न्याय अधूरा रह जाता है। लंबित मुकदमों की बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि न्याय केवल कागजों तक सीमित है, ज़मीनी स्तर पर नहीं। अधिकतर जाति आधारित मामलों में पीड़ित को न्याय दिया ही नहीं जाता या जानबूझ कर उसे लंबित रखा जाता है। यह स्थिति केवल कानून व्यवस्था की विफलता ही नहीं अपितु एक गहरी सामाजिक समस्या का संकेत है। जाति आज भी तय करती है कि कौन सुरक्षित है और कौन असुरक्षित, किसकी आवाज सुनी जाएगी और किसकी दबा दी जाएगी। अब जाति का भेदभाव पहले जैसा प्रत्यक्ष नहीं है, लेकिन पहले से अधिक खतरनाक जरूर हो गया है। यह मेरिट और योग्यता के नाम पर अवसरों को सीमित करता है। शिक्षा में फेलोशिप की कटौती, पीएचडी सीटों में कटौती, नॉट फॉर सूटेबल कैंडिडेट, बेसिक व सरकारी शिक्षा का कमजोर किया जाना ये सब केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक व्यापक संरचनात्मक असमानता के संकेत हैं। आरक्षण के विरोध में चल रही बहस भी इसी मानसिकता को उजागर करती है। आरक्षण को बार-बार अयोग्यता से जोड़कर खारिज करने की कोशिश की जाती है जबकि यह सामाजिक न्याय का एक संवैधानिक तरीका है। लेकिन जब इसे संस्थागत तरीके से कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, तो यह साफ हो जाता है कि समस्या आरक्षण नहीं, बल्कि बराबरी के विचार को दबाने की है। राजनीति में भी जाति का प्रभाव पहले से अधिक मजबूत हुआ है। बल्कि पूरी राजनीति ही जाति पर आश्रित हो चुकी है। चुनाव आते ही जातियां वोट बैंक में बदल दी जाती हैं। विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। यह लोकतंत्र के लिए एक गंभीर खतरा है क्योंकि यह नागरिकों को बराबरी के आधार पर नहीं, बल्कि पहचान के आधार पर विभाजित करता है जो बहुत अधिक चिंताजनक है। जाति अब केवल सामाजिक संरचना नहीं, बल्कि मानसिक संरचना के रूप में बदल चुकी है। जाति समाज के हर स्तर पर मौजूद है। ऊंची जातियों में भी, और वंचित वर्गों के भीतर भी। इसका मतलब यह है कि जाति केवल बाहरी व्यवस्था नहीं, बल्कि भीतर की सोच का हिस्सा बन चुकी है। डॉ बी. आर. अम्बेडकर ने चेतावनी दी थी कि यदि सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रही, तो लोकतंत्र केवल एक खोखला ढांचा बनकर रह जाएगा। आज उनके शब्द सच होते दिख रहे हैं। संविधान ने हमें बराबरी दी है, लेकिन सत्ता और समाज ने उसकी पूरी संरचना को बदल दिया है। अब वह खुली आँखों से दिखाई नहीं देती लेकिन उसने अपनी जड़े पहले से अधिक मजबूत और लंबी कर ली हैं!