@संपादकीय: स्वतंत्रता के 80 वर्षों बाद भी भारत की आम जनता का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है। आज़ादी के बाद से ही नागरिकों की मूलभूत अपेक्षाएँ “रोटी, कपड़ा और मकान” हर सरकार के सामने प्राथमिक चुनौती के रूप में रखी जाती रही हैं। मजदूर संगठनों का स्पष्ट मत रहा है कि जो सरकार इन बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती, उसकी उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। समय-समय पर सरकारों ने इन अपेक्षाओं को स्वीकार करते हुए “गरीबी हटाओ” जैसे नारे और कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी। संविधान की भावना के अनुरूप सबको शिक्षा और सबको स्वास्थ्य  उपलब्ध कराने की मांग लगातार उठती रही है। युवाओं ने रोजगार को बुनियादी अधिकार मानते हुए कई आंदोलनों के माध्यम से अपनी बात को प्रमुखता से रखा। फिर भी, वास्तविकता इससे अलग तस्वीर प्रस्तुत करती है। आज भी बड़ी संख्या में परिवार अपनी आजीविका के लिए सरकारी राशन पर निर्भर हैं। यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली बाधित हो जाए, तो अनेक घरों में दो वक्त का भोजन जुटाना मुश्किल हो जाता है। वस्त्र जैसी बुनियादी आवश्यकता की पूर्ति के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे वितरण अभियान इस कमी को उजागर करते हैं।

आवास की स्थिति भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। स्वतंत्रता के इतने दशकों बाद भी हर नागरिक को सम्मानजनक आवास उपलब्ध नहीं हो सके हैं। वहीं बेरोजगारी की समस्या चिंताजनक रूप धारण कर चुकी है स्थिति यह है कि उच्च शिक्षित युवा भी निम्न स्तर की नौकरियों के लिए आवेदन करने को विवश हैं। इसके अतिरिक्त, देश के कई हिस्सों में ‘बहुआयामी गरीबी’ गहरी जड़ें जमा चुकी है, जहाँ केवल आय का अभाव ही नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और जीवन स्तर से जुड़ी कई मूलभूत सुविधाओं की भी कमी है। ऐसे परिदृश्य में ‘पोषक भोजन’ जैसी आवश्यकताएँ भी प्राथमिकता सूची में पीछे छूट जाती हैं।

वर्तमान समय में नागरिकों से केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संघर्ष करने की ही अपेक्षा नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा और अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने की जिम्मेदारी भी उन पर है। इस प्रकार, जनता की भूमिका पहले की अपेक्षा अधिक व्यापक और जटिल हो गई है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या राज्य अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन उसी गंभीरता से कर पा रहा है, जैसी अपेक्षा नागरिकों से की जाती है? स्वतंत्रता के 80 वर्षों बाद भी यदि आम नागरिक एक सम्मानजनक और संतोषजनक जीवन से वंचित है, तो यह स्थिति गंभीर आत्ममंथन की मांग करती है। एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के जीवन स्तर में वास्तविक सुधार से संभव है। जनता की जिम्मेदारियाँ जितनी व्यापक हैं, सरकार की जवाबदेही भी उतनी ही ठोस और प्रभावी होनी चाहिए। तभी स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ आम नागरिक के जीवन में परिलक्षित हो सकेगा।