@संपादकीय: पिछले कुछ वर्षों में भारत की राजनीतिक और प्रशासनिक भाषा में एक नया प्रतीक उभरा है “बुलडोजर”। प्रश्न यह है कि क्या यह वास्तव में न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है, या बेलगाम अनियंत्रित सत्ता का प्रतीक? यह केवल अवैध निर्माण हटाने की मशीन नहीं रह गया; यह शासन की शैली, त्वरित दंड और शक्ति-प्रदर्शन का रूपक बन चुका है। उत्तर प्रदेश से लेकर अन्य राज्यों तक, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में, इस प्रवृत्ति को राजनीतिक समर्थन और वैचारिक वैधता दोनों मिले हैं। लेकिन मूल सवाल अब भी कायम है क्या यह “कानून का शासन” (Rule of Law) है या दंड का सार्वजनिक प्रदर्शन या सिरे से कानून का मजाक? लोकतंत्र की मूल भावना कहती है कि हर व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार मिले। मुकदमा दर्ज हो, जाँच हो, अदालत निर्णय दे तभी दंड तय होगा। परंतु बुलडोजर संस्कृति में अक्सर आरोप लगते ही कार्रवाई हो जाती है। घर गिरा दिए जाते हैं, संपत्ति ध्वस्त कर दी जाती है, और यह सब कैमरों की मौजूदगी में होता है। हम न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार कर प्रशासनिक शक्ति को दंड देने का अधिकार सौंप रहे हैं? यदि हाँ, तो यह केवल किसी एक व्यक्ति या समुदाय का प्रश्न नहीं है यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की बुनियाद का भी प्रश्न है।
बहुत सारे समर्थकों का तर्क है कि यह अवैध कब्जों और अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई है। वे इसे कानून का राज बताते हैं। लेकिन जब कार्रवाई चयनात्मक दिखे, जब न्यायालय के आदेश से पहले दंड जैसा प्रभाव उत्पन्न हो, तब यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का क्षरण है। लोकतंत्र में सत्ता की शक्ति सीमित और जवाबदेह होती है। यदि वही सत्ता अभियोजन, न्याय और दंड तीनों भूमिकाएँ निभाने लगे, तो शक्तियों के विभाजन (Separation of Powers) का सिद्धांत कमजोर पड़ जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ बुलडोजर एक प्रशासनिक उपकरण से अधिक एक राजनीतिक हथियार बन जाता है। सबसे गंभीर चिंता यह है कि इस प्रवृत्ति ने हिंसा को एक सामान्य और स्वीकृत प्रतिक्रिया बना दिया है। जब किसी के घर पर बुलडोजर चलता है और भीड़ ताली बजाती है, तो यह केवल एक संरचना का ध्वंस नहीं होता बल्कि यह संवैधानिक मूल्यों का भी क्षरण है। सत्ता यदि हिंसा को सरलीकृत और वैध बना देती है, तो समाज भी उसे नैतिक रूप से स्वीकार करने लगता है। लोग तब तक खुश होते हैं जब तक आग किसी और के घर में लगी हो। लेकिन इतिहास गवाह है कि दमन की आग कभी सीमाओं में नहीं रहती, एक दिन उसकी लपटें हर दरवाज़े तक पहुँचती हैं।
यह प्रक्रिया बीसवीं सदी के यूरोपीय सत्तावादी प्रवृत्तियों, विशेषकर नाजी जर्मनी की दंडात्मक राजनीति से प्रभावित दिखाई देता है। वहाँ भी राज्य की शक्ति को राष्ट्रहित के नाम पर असाधारण अधिकार दिए गए थे। परिणाम यह हुआ कि न्याय और मानवाधिकार पीछे छूट गए। हालाँकि भारत की अभी परिस्थितियाँ अलग हैं, परंतु इतिहास हमें चेतावनी देता है कि जब राज्य दंड को सार्वजनिक तमाशा बना देता है, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है। बुलडोजर संस्कृति केवल सरकार की नीति नहीं है, बल्कि यह समाज की स्वीकृति से ही फलती-फूलती है। यदि जनता त्वरित दंड को न्याय मान ले, तो न्यायिक प्रक्रिया बोझिल और अप्रासंगिक प्रतीत होने लगती है। लेकिन यह याद रखना होगा चाहे न्याय की प्रक्रिया धीमी हो, लेकिन वह नागरिक को अपने हक की बात करने, पक्ष रखने एवं न्याय व स्वतंत्रता की गारंटी देता है। आज यदि हम किसी और के घर पर चल रहे बुलडोजर पर मौन धारण किए हुए हैं या खुश हैं, तो कल वही मशीन हमारे दरवाज़े पर भी आ सकती है। तब हमारे पास बर्बादी और अफसोस जतलाने के अलावा कुछ नहीं बचेगा! इसलिए हर सजग, लोकतंत्र व न्याय पसंद लोगों को इसे लोकतंत्र और न्याय की कसौटी पर कसकर देखना-परखना होगा और आलोचनात्मक विवेक के साथ इसका प्रतीकार करना होगा। अन्यथा लोकतंत्र और न्याय पर शिकंजा कसता चला जाएगा, जिससे व्यापक आवाम के हक-अधिकार कुचलने का मार्ग प्रशस्त होता चला जाएगा।

