@संपादकीय: 20 मार्च, 1927 की तारीख इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। 20 मार्च को बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने पानी के लिए सत्यागृह किया था, जिसने भारतीय जाति व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था के हजारों वर्षों के कानून को तोड़ा था और वर्ण व्यवस्था जैसे सामाजिक विभेद को चुनौती दी थी। यह चुनौती सामाजिक लड़ाई, सामाजिक संघर्ष, सामूहिक अधिकार के लिए उद्घोष था क्योंकि उस वक्त तथाकथित अछूतों को सामूहिक संसाधनों के इस्तेमाल पर प्रतिबंधित था। एक तरह से उस वक्त उनका कोई भी सामाजिक वजूद नहीं था। 

Image source: Wikimedia Commons – “Flyer published before Mahad Satyagraha in 1927”, author unknown, 1927 (Public Domain, India)

महाड़ सत्याग्रह पानी पीने के अधिकार के साथ-साथ इंसान होने का अधिकार जताने के लिए भी किया गया आंदोलन था। डॉ. आंबेडकर ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘क्या यहां हम इसलिए आए हैं कि हमें पीने के लिए पानी नहीं मिलता है? क्या यहां हम इसलिए आए हैं कि यहां के जायकेदार कहलाने वाले पानी के हम प्यासे हैं? नहीं! दरअसल, इंसान होने का हमारा हक जताने के लिए हम यहां आए हैं।’ अगस्त 1923 को बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल (अंग्रेजों के नेतृत्व वाली समिति) के द्वारा एक प्रस्ताव लाया गया, कि वो सभी जगहें, जिनका निर्माण और देखरेख सरकार करती है, का उपयोग हर कोई कर सकता है। 

आज इस दिन को ‘सामाजिक सशक्तिकरण दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जो हमें यह याद दिलाता है कि सामाजिक न्याय केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि निरंतर संघर्ष की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य समाज में समानता, समता और अधिकारों के प्रति सजगता को बढ़ाना है चाहे वह जाति के आधार पर हो, लिंग के आधार पर, या आर्थिक असमानता के रूप में।

लेकिन क्या यह संघर्ष सचमुच समाप्त हो गया है? आज़ादी के 78 वर्षों बाद भी हकीकत यह है कि समाज के हाशिये पर खड़े दलितों और आदिवासियों के सामने वही सवाल अलग-अलग रूपों में मौजूद हैं। उन्हें अब भी उनकी जमीनों और घरों से बेदखल किया जाता है कभी दबंगों के जरिए, तो कभी प्रशासनिक तंत्र के साथ बने गठजोड़ के माध्यम से। 

जाति व्यवस्था की जड़ें शायद पहले से अधिक जटिल और अदृश्य हो चुकी हैं। वह खुलकर हमेशा दिखाई नहीं देती, लेकिन उसके प्रभाव समाज के व्यवहार में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। कहीं किसी कमजोर व्यक्ति के साथ अमानवीय व्यवहार होता है, कहीं दलित और आदिवासी महिलाओं के साथ हिंसा, बलात्कार और अत्याचार होते हैं, तो कहीं आज भी विवाह के समय घोड़ी पर चढ़ना विवाद का कारण बन जाता है। आज भी कई जगहों पर सामाजिक बराबरी स्वीकार नहीं की जाती । लोग आज भी कुछ घरों के सामने से गुजरते समय अपने चप्पल हाथ में उठा लेते हैं, समान स्तर पर बैठना या चारपाई साझा करना आज भी प्रतिबंधित है। यह सच्चाई हमें झकझोरती है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी सामाजिक संरचना में निहित भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उसकी जड़े किसी न किसी रूप में हमारे सामने हैं। तो क्या हम सचमुच एक लोकतान्त्रिक बराबरी वाले समाज की ओर बढ़ पाए हैं, या महाड़ की वह प्यास सम्मान, अधिकार और इंसान होने की पहचान की प्यास, आज भी किसी न किसी रूप में हमारे समाज में जिंदा है?