@संपादकीय: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस एक ऐसा दिन जब हम न केवल महिलाओं की उपलब्धियों का जश्न मनाते हैं, बल्कि उन सदियों पुरानी जंजीरों को याद करते हैं जिन्हें तोड़ने के लिए असंख्य महिलाओं (और कुछ पुरुषों) ने संघर्ष किया। भारत में नारीवाद की जड़ें गहरी हैं और इसमें डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा सावित्रीबाई फुले जैसे महान व्यक्तित्वों का योगदान अविस्मरणीय है।
सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षिका के रूप में जाना जाता है। 19वीं सदी में, जब लड़कियों को पढ़ाना पाप समझा जाता था, उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए स्कूल खोला। विधवाओं और दलित महिलाओं के लिए उन्होंने लड़ाई लड़ी, बाल विवाह और सती प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई। उनका संघर्ष सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं था यह जाति और लिंग के दोहरे उत्पीड़न के खिलाफ था। सावित्रीबाई ने दिखाया कि शिक्षा ही वह हथियार है जो महिलाओं को गुलामी से मुक्ति दिला सकता है।
इसी क्रम में डॉ. अम्बेडकर का नाम आता है, जिन्होंने भारतीय संविधान के माध्यम से महिलाओं को मौलिक अधिकार दिए। उन्होंने हिंदू कोड बिल का समर्थन किया, जिसमें महिलाओं को संपत्ति, तलाक और विवाह में समान अधिकार देने की कोशिश की गई। अम्बेडकर मानते थे कि नारीवाद बिना जाति-विरोधी संघर्ष के अधूरा है। उन्होंने कहा था कि महिलाओं की मुक्ति दलितों की मुक्ति से जुड़ी हुई है दोनों ही पितृसत्ता और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के शिकार हैं। उनका योगदान आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि मुख्यधारा का नारीवाद अक्सर ऊँची जाति की महिलाओं तक सीमित रह जाता है, जबकि दलित और आदिवासी महिलाएँ दोहरी-तीनहरी मार झेलती हैं।
आज के भारत में नारी की स्थिति में बदलाव दिखता तो है, लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। एक तरफ महिला श्रम बल भागीदारी दर 23% से बढ़कर 41% के आसपास पहुँच गई है, MSME में महिलाओं का स्वामित्व दोगुना हुआ है और लखपति दीदी जैसी योजनाओं से करोड़ों महिलाएँ आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं। लेकिन दूसरी तरफ, कार्यस्थल पर यौन हिंसा, घरेलू हिंसा और ऑनलाइन ट्रोलिंग जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं। ग्रामीण भारत में अभी भी लड़कियों की शिक्षा अधूरी रह जाती है और पितृसत्ता का जाल मजबूत है।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं यह याद दिलाने का दिन है कि संघर्ष जारी है। सावित्रीबाई और अम्बेडकर की विरासत को आगे बढ़ाते हुए, आज की महिलाएँ चाहे वह सविता डाकले हों या कोई अनाम लखपति दीदी साबित कर रही हैं कि बदलाव संभव है। लेकिन बदलाव तब तक पूरा नहीं होगा, जब तक हर महिला दलित, आदिवासी, गरीब, ग्रामीण को समान अवसर, सुरक्षा और सम्मान नहीं मिल जाता।
नारीवाद कोई फैशन नहीं, बल्कि क्रांति है। इसे जाति, वर्ग और लिंग के चश्मे से देखना होगा। तभी सच्चा सशक्तिकरण संभव होगा।
आप सभी को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं। : डॉ. नीलेश साहू

