@संपादकीय: भारत सरकार ने हाल ही में आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 को सक्रिय करते हुए एलपीजी और सीएनजी को आवश्यक वस्तुओं की सूची में शामिल किया है। सामान्यतः यह कानून तभी लागू किया जाता है जब किसी जरूरी वस्तु की कमी होने लगे या उसकी कालाबजारी, अनियमित मूल्य वृद्धि हो रही हो। इसलिए यह कदम केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि देश की ऊर्जा आपूर्ति को लेकर समस्या है।
Government of India invokes the Essential Commodities Act, 1955, to regulate the availability, supply and equitable distribution of petroleum and petroleum products and natural gas pic.twitter.com/OqtsDwb13s
— ANI (@ANI) March 10, 2026
पिछले कुछ दिनों से देश के कई हिस्सों में रसोई गैस की उपलब्धता को लेकर खबरे सामने आ रही हैं। कई शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं और सीएनजी स्टेशनों पर भीड़ और अफरा तफरी मची है। ऐसे में एलपीजी और सीएनजी को आवश्यक वस्तु घोषित करना यह बताता है कि सरकार वितरण व्यवस्था को नियंत्रित करना चाहती है, ताकि जमाखोरी और कालाबाजारी को रोका जा सके। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि यदि स्थिति सामान्य थी, जैसा कि सरकार दावा कर रही थी, तो फिर अचानक इस तरह का प्रशासनिक कदम उठाने की जरूरत क्यों पड़ी?
भारत में एलपीजी अब केवल एक ईंधन नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की दैनिक जरूरत का हिस्सा बन चुकी है। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार देश में लगभग 32.94 करोड़ सक्रिय घरेलू एलपीजी उपभोक्ता हैं, जिनमें से 10 करोड़ से अधिक परिवार प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थी हैं। यही कारण है कि भारत आज दुनिया के सबसे बड़े एलपीजी उपभोक्ताओं में शामिल हो चुका है। इतनी बड़ी आबादी की रसोई जब किसी एक ऊर्जा स्रोत पर निर्भर हो, तो उसकी आपूर्ति में थोड़ी-सी भी अनिश्चितता सीधे सामाजिक और राजनीतिक चिंता का कारण बन जाती है। समस्या यह है कि भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। देश में एलपीजी की खपत लगभग 33 मिलियन टन प्रतिवर्ष तक पहुँच चुकी है और इसका बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। इस आयात का लगभग 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया के देशों से आता है। इसलिए उस क्षेत्र में होने वाला कोई भी राजनीतिक या सैन्य तनाव सीधे भारत की रसोई तक असर डालता है।
I rise to inform the House of the steps taken in response to the disruption to the global energy supply arising from the ongoing conflict in West Asia.
— PIB India (@PIB_India) March 12, 2026
The world has not faced a moment like this in modern energy history. Today is the 13th day since the passage through the Strait… pic.twitter.com/o5Ou57zN4l
वर्तमान संकट की पृष्ठभूमि भी इसी क्षेत्र से जुड़ी है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों पर असुरक्षा के कारण ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। विशेष रूप से Strait of Hormuz को विश्व का सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस मार्ग माना जाता है, जहाँ से वैश्विक ऊर्जा व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि यह मार्ग प्रभावित होता है तो भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर उसका प्रभाव तुरंत दिखाई देता है। भारत के ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर आता है। यहाँ सबसे गंभीर प्रश्न सरकार की विश्वसनीयता का है। कुछ ही सप्ताह पहले सरकार की ओर से यह दावा किया गया था कि देश में गैस या पेट्रोल की आपूर्ति को लेकर कोई संकट नहीं है और यदि Strait of Hormuz प्रभावित भी होता है तो भारत पर उसका विशेष असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अब एलपीजी और सीएनजी को आवश्यक वस्तु घोषित करना यह संकेत देता है कि वास्तविक स्थिति उतनी सहज नहीं है जितनी जनता को बताई जा रही थी। दरअसल ऊर्जा संकट केवल अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का परिणाम नहीं होता। कई बार घरेलू नीतियाँ भी प्रभावी होती है साथ ही भंडारण क्षमता, आयात के स्रोतों की विविधता और कूटनीतिक रणनीति भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि किसी देश के पास पर्याप्त भंडारण क्षमता नहीं हो, ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को पर्याप्त बढ़ावा न मिला हो, या आयात के स्रोत सीमित हों, तो वैश्विक संकट जल्दी घरेलू संकट में बदल जाता है। देश की बिडम्बना है कि ऊर्जा सुरक्षा को अभी भी दीर्घकालिक रणनीति की तरह नहीं बल्कि तात्कालिक प्रबंधन की तरह देखा जाता है। संकट सामने आने के बाद कानून लागू करना और नियंत्रण बढ़ाना आसान उपाय है, लेकिन यह नीति-निर्माण की दूरदर्शिता का विकल्प नहीं हो सकता।
इतिहास पर यदि नजर डाले तो हमें पताचलता है कि अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का सबसे बड़ा बोझ आम लोगों पर ही पड़ता है। द्वातीय विश्व युद्ध के दौरान यूरोप और एशिया के कई देशों ने भुखमरी और लाचारी देखी है। जर्मनी के सनकी तानाशाह ने अपने देश को युद्ध में धकेल दिया परिणाम क्या हुआ। पूरा देश राख़ और खंडहर में तब्दील होगया। इसी तरह हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमबारी का परिणाम बताता है कि युद्ध का अंत अक्सर मानवीय त्रासदी में होता है, जिसका असर कई पीढ़ियों तक बना रहता है। वैश्विक संघर्ष केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका सीधा असर भोजन, पानी और ऊर्जा जैसी बुनियादी जरूरतों पर भी पड़ता है और ऊर्जा सुरक्षा केवल तात्कालिक उपायों से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके लिए दीर्घकालिक नीतियों की आवश्यकता होती है। एलपीजी और सीएनजी को आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत लाना यह दर्शाता है कि सरकार स्थिति को गंभीरता से देख रही है। लेकिन केवल कानून लागू कर देना पर्याप्त नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या सरकार ऊर्जा सुरक्षा को लेकर दीर्घकालिक और पारदर्शी नीति बनाने के लिए तैयार है, या फिर हर संकट के समय केवल तात्कालिक उपायों, या आत्मनिर्भरता की बयानबाजी से काम चलाया जाएगा। क्योंकि विकसित भारत का सपना केवल नारों और हवाबाजी से नहीं, बल्कि मजबूत नीतियों, पारदर्शी शासन, दूरदर्शी योजना और अंतोदय से ही साकार किया जा सकता है।

