@संपादकीय: आज का समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ परिवार का अर्थ चुपचाप बदल रहा है। कभी एक ही छत के नीचे कई पीढ़ियों का साथ होना सामान्य था, लेकिन अब परिवार सिमट रहे हैं और सिर्फ सिमट नहीं रहे, बिखर भी रहे हैं। एक ही परिवार के लोग अलग-अलग शहरों में रहने लगे हैं। यह बदलाव केवल आधुनिक जीवनशैली या व्यक्तिगत पसंद का परिणाम मान लेना आसान है, लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है? दरअसल, इस बदलाव के पीछे बाजार और आर्थिक नीतियों की गहरी छाया है। हम जिस व्यवस्था में जी रहे हैं, वह केवल हमारे काम करने के तरीके को नहीं, बल्कि हमारे रिश्तों की संरचना को भी तय कर रही है। “डायस्पोरा” शब्द आमतौर पर देश छोड़कर दूर बसने से जुड़ा रहा है। लेकिन आज यह दूरी भौगोलिक सीमाओं से आगे बढ़ चुकी है। अब एक ही देश के भीतर, एक ही परिवार के भीतर, एक नया “आंतरिक डायस्पोरा” बन रहा है। पति एक शहर में, पत्नी दूसरे शहर में और कई बार बच्चे किसी तीसरे स्थान पर। यह केवल मजबूरी नहीं, बल्कि एक ऐसी आर्थिक संरचना का हिस्सा है, जो श्रम को वहां ले जाती है जहाँ बाजार को उसकी जरूरत होती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में परिवार का औसत आकार घटकर 4.48 रह गया, जो 1991 में 5.32 था। यह सिर्फ संख्या का परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना के विघटन का संकेत है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और न्यूक्लियर फैमिली का विस्तार हो रहा है लेकिन यह विस्तार स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील और बिखरा हुआ है।

देश में आंतरिक प्रवास का तेजी से बढ़ना इस बदलाव को और स्पष्ट करता है। लगभग 45 करोड़ लोग यानी करीब 37 प्रतिशत आबादी अपने मूल स्थान से कहीं और जाकर रह रही है। पुरुषों का बड़ा हिस्सा रोजगार के लिए और महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा विवाह के कारण स्थान बदलता है। महानगर दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु इस बिखराव के सबसे बड़े केंद्र बन चुके हैं। लेकिन यह केवल स्थान परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह उपभोग की भी कहानी है। जब एक परिवार दो शहरों में बंटता है, तो वह केवल भौगोलिक रूप से नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी दो हिस्सों में बंट जाता है। दो घर, दो सेट सामान, दो तरह के खर्च एक परिवार, दो उपभोक्ता इकाइयाँ। बाजार के लिए यह एक अवसर है, और शायद यही वह बिंदु है जहाँ से इस पूरी प्रक्रिया को समझना जरूरी हो जाता है। ड्यूल इनकम का बढ़ना, खर्चों का बढ़ना, और जीवनशैली का बदलना ये सब मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ व्यक्ति की पहचान धीरे-धीरे उसके संबंधों से हटकर उसकी उपभोग क्षमता से जुड़ती जा रही है। 2023-24 के आंकड़े बताते हैं कि शहरों में औसत मासिक खर्च ₹7,000 से अधिक हो चुका है। जब परिवार अलग-अलग रहते हैं, तो यह खर्च कई गुना तक बढ़ जाता है।

इस बदलाव के सकारात्मक पक्षों को नकारा नहीं जा सकता। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ी है, स्वतंत्रता के नए आयाम खुले हैं, और नई पीढ़ी को अधिक अवसर मिल रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही कुछ असहज सवाल भी उभरते हैं। बच्चों की परवरिश अब एक जटिल चुनौती बनती जा रही है। मानसिक स्वास्थ्य, जिनमें ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर जैसे मामले भी शामिल हैं, धीरे-धीरे अधिक दिखाई देने लगे हैं। बुजुर्गों की देखभाल एक अलग संकट के रूप में सामने आ रही है। और रिश्ते अब केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि समय और दूरी की गणना में बंधते जा रहे हैं। आज बिना बच्चों के जीवन को स्वीकार करना भी सामान्य होता जा रहा है। लेकिन क्या यह पूरी तरह व्यक्तिगत चुनाव है, या फिर यह उस आर्थिक दबाव का परिणाम है जो हमें लगातार व्यस्त और उत्पादक बनाए रखने की मांग करता है?

अगर इन सभी पहलुओं को एक साथ देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि हम एक नए प्रकार के डायस्पोरा में जी रहे हैं । एक ऐसा डायस्पोरा जो न युद्ध का परिणाम है, न किसी आपदा का परिणाम है बल्कि बाजार की संरचना और आर्थिक नीतियों का उत्पाद है। यह एक आर्थिक डायस्पोरा है, जहाँ प्रवासन रोजगार के अवसरों द्वारा संचालित होता है। साथ ही आंतरिक या रिजनल डायस्पोरा है, जहाँ देश के भीतर ही परिवार बिखर जाते हैं। और यह एक उपभोक्ता डायस्पोरा भी है, जहाँ व्यक्ति की पहचान उसके उपभोग से तय होती है। सवाल यह नहीं है कि यह बदलाव हो रहा है या नहीं सवाल यह है कि हम इसे कैसे देख रहे हैं। क्या हम सचमुच आधुनिक हो रहे हैं, या केवल बाजार की जरूरतों के अनुसार खुद को ढालते हुए अपने ही रिश्तों से दूर होते जा रहे हैं?