@संपादकीय: मानव सभ्यता का इतिहास केवल विकास और प्रगति का इतिहास नहीं है बल्कि यह त्रासदियों, संघर्षों और मानवीय पीड़ा का भी इतिहास रहा है। हर पीढ़ी ने किसी न किसी बड़े संकट को झेला है और उन भयावह अनुभवों की साक्षी रही हैं जिन्हें आज हम इतिहास की किताबों में पढ़ते हैं। युद्ध, अकाल, महामारी और विस्थापन। लेकिन समय के साथ वे पीढ़ियाँ समाप्त होती जा रही हैं या हो गई। वर्तमान पीढ़ी ने भी अभी हाल ही में एक ऐसी वैश्विक त्रासदी का सामना किया है, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया कोविड-19, इस महामारी ने न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि यह भी दिखा दिया कि हमारी सामाजिक संरचना कितनी असमान और कमजोर है। महामारी के दौरान दुनिया भर में करोड़ों लोग प्रभावित हुए। स्वास्थ्य सेवाएँ चरमरा गईं, अर्थव्यवस्थाएँ डगमगा गईं और समाज के सबसे कमजोर वर्गों की स्थिति सबसे अधिक खराब हुई। भारत में ही लाखों प्रवासी मजदूर सड़कों पर पैदल चलते हुए दिखाई दिए। यह दृश्य केवल एक मानवीय संकट नहीं था, बल्कि हमारे विकास मॉडल पर एक गहरा सवाल भी था। जब संकट आया, तो समाज के सबसे कमजोर लोग ही सबसे पहले और सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।
इतिहास बताता है कि ऐसी त्रासदियाँ केवल महामारी तक सीमित नहीं होतीं। युद्ध भी मानवता के लिए उतनी ही बड़ी आपदा होते हैं। बीसवीं सदी में दो बड़े युद्धों ने दुनिया को तबाह कर दिया प्रथम विश्व युद्द और द्वातीय विश्व युद्ध । इन युद्धों में करोड़ों लोग मारे गए और उससे भी अधिक लोग विस्थापित हुए। लेकिन इन युद्धों का सबसे गहरा असर उन लोगों पर पड़ा जो पहले से ही कमजोर थे। उनके घर उजड़े, उनके परिवार बिखरे और उनका भविष्य अनिश्चित हो गया।
आज भी दुनिया पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। विभिन्न क्षेत्रों में युद्ध और संघर्ष जारी हैं, और लाखों लोग अपने घरों से बेघर होकर शरणार्थी जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। किसी भी युद्ध या त्रासदी का सबसे बड़ा बोझ वही वर्ग उठाता है, जिसकी आवाज़ और आर्थिक स्थिति सबसे कमजोर होती है। यहीं से समाज कार्य की आवश्यकता और प्रासंगिकता सामने आती है। समाज कार्य केवल सहायता या दान का कार्य नहीं है, बल्कि यह समाज की संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का प्रतीक है। यहीं समाज कार्य की भूमिका उभरती है। यह संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का प्रतीक है। हर वर्ष मार्च के तीसरे सप्ताह (2026 में 17 मार्च) विश्व समाज कार्य दिवस मनाया जाता है, IFSW द्वारा इस बार की थीम: ‘Co-Building Hope and Harmony: A Harambee Call to Unite a Divided Society’ एकजुटता की पुकार, उद्देश्य और सेवा के महत्व को रेखांकित करना है। जिसे वैश्विक स्तर पर International Federation of Social Workers और अन्य संस्थाओं द्वारा मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य समाज में सामाजिक सेवा के महत्व को रेखांकित करना और उन लोगों के योगदान को सम्मान देना है, जो अपने जीवन का बड़ा हिस्सा समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के लिए समर्पित करते हैं। यह दिन हमें अपने समाज के सामने खड़े मूलभूत प्रश्नों को समझने उनके निवरण पर भी सोचने के लिए विवश करता है। क्या हम वास्तव में एक संवेदनशील समाज हैं? क्या हमारी सामाजिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था ऐसी है जो संकट के समय सबसे कमजोर लोगों की रक्षा कर सके?
महामारी के दौरान समाज कार्यकर्ताओं और सामुदायिक संगठनों (एनजीओ) ने अद्भुत कार्य किए। उन्होंने भोजन, दवाइयाँ, परामर्श और राहत पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन यह भी सच है कि यदि समाज की मूल संरचना अधिक न्यायपूर्ण और संवेदनशील होती, तो शायद इतनी बड़ी संख्या में लोग संकट में न फँसते। यह विडंबना ही है कि जिस दुनिया ने विज्ञान, तकनीक और आर्थिक विकास में अभूतपूर्व प्रगति की है, वही दुनिया आज भी ऐसी स्थितियों से जूझ रही है जहाँ लाखों लोग बुनियादी आवश्यकताओं से वंचित हैं। युद्धों पर खरबों डॉलर खर्च किए जाते हैं, लेकिन सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा पर उतना ही कम ध्यान दिया जाता है। समाज कार्य का मूल उद्देश्य केवल संकट के बाद राहत देना नहीं है, बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों को बदलना भी है जो संकट को जन्म देती हैं। आज जब हम विश्व समाज कार्य दिवस मना रहे हैं, तो यह केवल समाज कार्यकर्ताओं के योगदान का सम्मान करने का दिन नहीं है। यह दिन हमें सोचने पर मजबूर करता है कि समाज की वास्तविक प्रगति क्या है। क्या ऊँची इमारतें, तेज़ अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास ही प्रगति के मूलभूत संकेत हैं, या संकट के समय समाज अपने सबसे कमजोर वर्ग के सदस्यों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण एवं सोचनीय प्रश्न है?

