@संपादकीय: हाल ही में सामने आए एक वीडियो ने एक बार फिर समाज के उस हिस्से को हमारे सामने ला खड़ा किया है, जो लगातार हमारे समाज में मौजूद है लेकिन अदृश्य तौर पर, यदि दिखाई भी देता है तो हम अक्सर उसे देखने से बचते हैं। बछाड़ा और बेड़िया समुदाय की लड़कियों का सेक्स वर्क से जुड़ा होना कोई नई बात नहीं है लेकिन हर बार जब यह सच सामने आता है तो हमारे विकसित समाज के दावों पर सवाल और गहरे हो जाते हैं। दिल्ली की एक सामाजिक कार्यकर्ता के पॉडकास्ट में जीबी रोड का भी जिक्र किया जहाँ कोठों का बँटवारा प्रदेशों के आधार पर होता है। यह इस बात को दर्शता है कि सेक्स वर्क केवल किसी की व्यक्तिगत कहानी नहीं, बल्कि एक संगठित तौर पर होने वाली सच्चाई का हिस्सा है। सवाल यह है कि क्या 21वीं सदी में भी कुछ समुदायों की लड़कियों के लिए शरीर ही जीविका का प्रमुख साधन बना हुआ है? क्या यह उनकी स्वेच्छा है? या फिर एक ऐसी मजबूरी, जिसे हमारे समाज ने मिलकर सामान्य बना दिया है?
![]() |
| Photo : Dr. Naresh Gautam |
बेड़िया, बछाड़ा और कुछ दूसरे घुमंतू-अर्द्ध-घुमंतू समुदायों को औपनिवेशिक दौर में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1871 के तहत जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया था। यह केवल एक कानून नहीं था, बल्कि सामाजिक बहिष्कार का आधिकारिक प्रमाणपत्र था। जिसने इन समुदायों को जड़, जमीन, शिक्षा और सम्मानजनक रोजगार से व्यवस्थित रूप से दूर कर दिया। आज भी डीनोटिफाइड ट्राइब्स के रूप में पहचाने जाने वाले ऐसे समुदायों की साक्षरता और रोज़गार के आँकड़े राष्ट्रीय औसत आँकड़ों से बहुत ही कम हैं। लेकिन इन आंकड़ों की प्रगति पर कोई फीडबैक नहीं लिया जाता न ही इनके विफल होने पर सवाल उठाए जाते हैं। एनसीईआरटी और तमाम सारे लघु-शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि इन्हें ऐतिहासिक रूप से शैक्षिक एवं सामाजिक पूँजी से वंचित रखा गया। तभी तो शिक्षा के लिए सरकारी योजनाओं के नाम पर इनके हाथ केवल घुमंतू और अर्धघुमंतु जैसे शब्दों का उपयोग करके पल्ला झाड़ लिया जाता है। वहीं जब वोट बैंक की बात आती है तो यही समुदाय अनुसूचित जाति और जनजाति की गिनती में सुमार हो जाते हैं। जहां नाम तो है पर उसके लाभ और दस्तावेज कभी पूरे नहीं हो पाते! और न ही बन पाते है उन महिलाओं के बच्चों के पिता, जो बिन ब्याही मांए बन जाती हैं और इस पितृसत्तात्मक समाज में केवल मां के नाम पर न तो समाज स्वीकार्य करता है न ही सरकारें। और फिर जब सारे विकल्प खतम हो जाते हैं, तब जो बचता है। वही यही परंपरा कहलाने लगती है, और यही वह बिंदु है जहाँ परंपरा और मजबूरी खतरनाक ढंग से एक दूसरे में घुल जाती हैं। इनके लिए अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि इन समुदायों में सेक्स वर्क एक परंपरा है, जिसे महिलाएँ खुद अपनाती हैं। लेकिन फिर प्रश्न यह भी उठता है कि आखिर यह अपने ग्राहक कहाँ से लाती हैं? दरअसल यह समाज दोहरी मानसिकता वाला समाज है जो इनके लिए ग्राहक भी है और इंकार भी करता है। मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई एरिया में बछाड़ा समुदाय की युवतियों के बारे में कई रिपोर्टें बताती हैं कि सड़क किनारे एवं घरों से देह व्यापार पीढ़ियों से चल रहा है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, बछाड़ा समुदाय में हज़ारों नाबालिग लड़कियाँ और महिलाएँ इस परंपरागत वेश्यावृत्ति के दलदल में फँसी हुई हैं, जहाँ परिवार वाले ही कच्ची उम्र में बेटियों को इस धंधे में धकेल देते हैं।
![]() |
| Photo : Dr. Naresh Gautam |
राजस्थान में बेड़िया समुदाय पर किए गए हालिया टीवी रिपोर्टों में दिखाया गया कि लगभग 300 साल पुरानी मानी जाने वाली बेड़िया प्रथा के तहत घर की महिलाओं पर ही कमाई की पूरी जिम्मेदारी होती है, जबकि पुरुष अक्सर बिचौलिये या छोटा-मोटा काम कर अपना खर्च उठाते हैं। उन्हें बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी लड़कियों के कंधों पर है, जब आस-पास के गाँव, पुलिस प्रशासन, स्थानीय बिचौलिये और ग्राहक एक ही ढाँचे का हिस्सा बन जाएँ, तो क्या इस निर्णय को वास्तव में स्वेच्छा कहा जा सकता है?
यहाँ चयन का सवाल गहरे सामाजिक संदर्भ में फँसा है। उनके लिए शिक्षा की पहुँच बहुत सीमित है, स्कूल ड्रॉप आउट दर ऊँची है और नौकरी के अवसर लगभग न के बराबर हैं। और उसी का परिणाम है सेक्स वर्क को काम के रूप में सामान्य कर दिया जाना है।
दिल्ली के जीबी रोड जैसे रेड लाइट इलाकों का जिक्र इस समस्या के एक और पहलू को उजागर करता है। जीबी रोड पर प्रदेशवार, भाषावार और जातिवार आधार पर महिलाओं को कोठों में बाँटकर रखा जाता है। जहाँ अलग-अलग राज्यों और समुदायों की लड़कियों के लिए अलग लाइनें और अलग रेट फिक्स होते हैं। और यह सब काम सप्लाई चेन, बिचौलियों, एजेंटों, कर्ज और हिंसा पर टिके एक पूरे नेटवर्क की मजबूत संरचना है।
मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा से गुजरते हाईवे के किनारे बने डेरों से लेकर बड़े शहरों के रेड लाइट इलाकों तक, सेक्स वर्क में शामिल कई लड़कियाँ और महिलाएँ अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि धोखे, दबाव, कर्ज, बंधक बनाकर या मानव तस्करी के जरिए इस पेशे में लाई जाती हैं। ऐसे में यह कहना कि यह उनकी “परंपरा” है या वे स्वेच्छा से इस काम में हैं, दरअसल उन गहरी सामाजिक और आर्थिक मजबूरियों को नजरअंदाज करने का एक आसान तरीका बन जाता है। बछाड़ा और बेड़िया जैसे समुदाय सरकारी फाइलों और योजनाओं में तो मौजूद हैं, लेकिन नीतिगत प्राथमिकताओं में अक्सर हाशिये पर ही रहते हैं। पुनर्वास, शिक्षा और कौशल विकास की योजनाएँ कागज़ों पर जरूर दिखाई देती हैं पर जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। अक्सर देखा गया है कि जब ये मुद्दे मीडिया में सुर्खियाँ बनते हैं, तब थोड़े समय के लिए प्रशासन सक्रिय होता है। इन समुदायों को सड़क किनारों से हटाया जाता है और योजनाएँ चलती हुई दिखाई देती हैं। लेकिन जैसे ही खबरें पुरानी पड़ती हैं फिर से यह समुदाय फिर उसी चक्र में लौट आते हैं। यह स्थिति केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि राज्य की विफलता को भी उजागर करती है। जब पुनर्वास केवल कागज़ों तक सीमित रह जाता है और रोजगार के ठोस साधन उपलब्ध नहीं कराए जाते, तब समुदायों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि परंपरा के नाम पर शोषण का यह चक्र लगातार चलता रहता है।
केंद्र सरकार बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास के लिए प्रति व्यक्ति 1 लाख से 3 लाख रुपये तक की सहायता और तत्काल राहत के रूप में 30,000 रुपये तक की मदद जैसी योजनाएँ चलाती है। लेकिन जाति आधारित यौन शोषण झेल रहे इन समुदायों तक इन योजनाओं का लाभ बहुत सीमित रूप में ही पहुँच पाया है। यह अंतर साफ दिखाता है कि कागज़ी विकास और जमीनी न्याय के बीच अभी भी बड़ी दूरी है। मध्य प्रदेश के सागर जिले के कई गाँवों में चम्पाबेन (सामाजिक कार्यकर्ता) ने लंबे समय तक सामाजिक उत्थान के लिए काम किया, जिसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए। कई गाँवों ने मिलकर इस परंपरागत पेशे का बहिष्कार किया, और कुछ लोग शिक्षा हासिल कर नौकरियों तक पहुँचे। लेकिन इसके बावजूद कई परिवारों को दोबारा उसी दलदल में लौटना पड़ा, क्योंकि उनके पास आजीविका के स्थायी और सम्मानजनक विकल्प उपलब्ध ही नहीं थे? इसलिए यह उनका स्वतंत्र चयन नहीं बल्कि संगठित राजनीतिक विफलता का हिस्सा हैं।



