@संपादकीय: 23 मार्च 1931 को फाँसी के तख्ते पर एक जीवन समाप्त हो गया था, पर उसने एक ऐसी लकीर खींच दी जो कभी मिटाई नहीं जा सकती क्योंकि विचार और सपने कभी मरते नहीं वे आने वाले पीढ़ियों की विरासत बन जाते हैं। उनका संघर्ष केवल अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ नहीं था, बल्कि उससे आगे बढ़कर उस आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ भी था, जो शोषण पर टिकी हुई थी। उन्होंने जिस भारत का सपना देखा था, वह केवल राजनीतिक आजादी तक सीमित नहीं था। वह एक ऐसे भारत की कल्पना थी जहाँ मजदुर, किसान और मजलूम जनता को वास्तविक आर्थिक आजादी मिले, जहाँ बराबरी हो, और जहाँ एक स्वतंत्र, न्यायपूर्ण और साम्यवादी समाज का निर्माण हो! उन्होंने अपने प्राणों की मुहर इस विचार पर लगाई थी। लेकिन आज प्रश्न उठता है कि क्या भगत सिंह के विचार आज भी जिंदा हैं? क्या भारत उस रास्ते पर आगे बढ़ा है, जिसकी दिशा उन्होंने तय की थी?

आज का भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ बाज़ारवाद और पूंजी का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। यह पूंजी अब केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज, संस्कृति, शिक्षा और राजनीति तक गहराई से फैल चुकी है। तत्कालीन अंग्रेजी साम्राज्यवाद की जगह आज एक नया आर्थिक साम्राज्य खड़ा हो चुका है जहाँ निर्णय जनता के हित में कम और बाजार के हित में अधिक लिए जाते हैं। जिस तरह से सत्ताधारी ताकतों ने देश की संस्थाओं को कमजोर किया है, और जिस तरह से संविधान की मूल भावना समानता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता को धीरे-धीरे कमजोर करने की कोशिशें जारी है, वह वाकई चिंताजनक है। भारत का संविधान जो जनता को अधिकार देता है, लेकिन आज उसी के स्वरूप को बदलने कोशिशें बहुत तेजगति से जारी हैं।

बाज़ार और पूंजी ने समाज को इस तरह प्रभावित किया है कि इंसान की पहचान अब उसके विचारों या मानवीय मूल्यों से नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक समप्न्न्ता से तय होने लगी है। शिक्षा एक अधिकार से ज्यादा एक उत्पाद में बदल गई है, स्वास्थ्य सेवाओं पर बाजार का कब्जा है, और रोजगार माँगना उस पार बात करना देश का सबसे बड़ा जुर्म बन चुका है। पूरे-पूरे गाँवों का शहरों की ओर पलायन, किसानों की बदहाली, मजदूरों की असुरक्षा। ये सब उसी व्यवस्था के संकेत हैं, जहाँ विकास का अर्थ केवल कुछ लोगों की समृद्धि तक सीमित रह गया है। आम जनता, जिसके लिए आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी, वही आज अपने हक और सम्मान के लिए संघर्ष कर रही है। क्या भगत सिंह का सपना यही था कि भारत फिर से एक नए तरह के बाजारवाद, पूंजीवाद की गिरफ्त में आ जाए? क्या उन्होंने इसलिए अपने प्राण दिए थे कि सत्ता और व्यवस्था आम जनता के साथ वैसा ही व्यवहार करे, जैसा कभी ब्रिटिश शासन में हुआ करता था? सच तो यह है कि आज सत्ता को सबसे ज्यादा डर किसी दुश्मन देश से नहीं, बल्कि अपने ही नागरिकों के सवालों से है। इसलिए इतिहास बदला जा रहा है, नफरत बोई जा रही है, और युवाओं को रोजगार के बजाय भावनाओं में उलझाया जा रहा है। पूंजीवाद ने इस देश की जड़ों को खोखला कर दिया है। अमीरी और गरीबी के बीच की खाई अब खतरनाक स्तर तक पहुँच चुकी है। एक तरफ कुछ लोगों के पास अपार संपत्ति है, दूसरी तरफ करोड़ों लोग बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।