@संपादकीय: दुनिया आज मानो युद्ध के मुहाने पर बैठी है। लगभग हर देश अपनी शक्ति, सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण बढ़ाने के होड़ में लगा हुआ है। लेकिन इतिहास गवाह है कि इस प्रकार के संघर्षों में सबसे अधिक प्रभावित वही वर्ग होता है, जो पहले से ही गरीबी की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़ा है। दुनिया के मेहनतकश मजदूर कई आर्थिक कठिनाइयों से घिरे हैं। करोड़ों श्रमिक भूखे रहते हैं, दूषित पानी पीते हैं, जानलेवा बीमारियों से ग्रसित हैं, अपने बच्चों को मरते हुए देखते हैं, दस वर्ष की आयु से पहले अपने बच्चों को काम पर भेजते हैं, अंजाने या मजबूरी में कम वेतन के लिए घंटों देर तक काम करते हैं, अपने आप को बेरोजगार पाते हैं, झुग्गियों में रहते हैं जहाँ न पेयजल की सुविधा होती है और न जल के निकास की कोई व्यवस्था। जहरीली हवा में साँस लेते हुए हर दिन क्रूरता और दमन सहते हैं।     

गरीबी पर चर्चा अकसर केवल संसाधनों की कमी अथवा न्यूनता के नजरिए से की जाती है, जबकि वास्तविक संकट संपत्ति और सत्ता के असमान तथा आक्रामक तरीके के केंद्रीकरण का है। जब समाज के अधिकांश संसाधन व संपत्ति कुछ गिने-चुने लोगों के हाथों में सिमट जाती है, तब बहुसंख्यक आबादी के हिस्से में अभाव, असुरक्षा और परनिर्भरता ही आती है।

वैश्विक स्तर पर असमानता इस हद तक बढ़ चुकी है कि हाल के वर्षों में दुनिया में उत्पन्न नई संपत्ति का लगभग 82 प्रतिशत हिस्सा केवल शीर्ष के 1 प्रतिशत आबादी के हाथों में केंद्रित हो गया है। जबकि दुनिया की आधी आबादी की संपत्ति में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है। यह दर्शाता है कि आर्थिक विकास का लाभ व्यापक समाज तक पहुँचने के बजाय उच्चवर्ग तक सिमटता जा रहा है।

भारत में भी तस्वीर इससे अलग नहीं है। विभिन्न असमानता संबंधी रिपोर्टों के अनुसार भारत में कुल संपत्ति का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा सबसे धनी 10 प्रतिशत आबादी के पास है, जबकि लगभग 40 प्रतिशत संपत्ति केवल शीर्ष 1 प्रतिशत के नियंत्रण में है। ऑक्सफैम के आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 में भारत में पैदा हुई कुल नई संपत्ति का लगभग 73 प्रतिशत हिस्सा सबसे अमीर 1 प्रतिशत के पास चला गया, जबकि निचले 50 प्रतिशत यानी लगभग 67 करोड़ लोगों की संपत्ति में केवल 1 प्रतिशत वृद्धि हुई। इसका मतलब यह है कि अमीरी केवल बढ़ नहीं रही, बल्कि आर्थिक संसाधनों का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर लगातार स्थानांतरित हो रहा है।

संपत्ति का यह असंतुलित केंद्रीकरण केवल आर्थिक तथ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता संरचना की भी हक़ीक़त है। जब समाज की पूँजी, संसाधन और आर्थिक ताकत सिर्फ उच्च वर्ग के हाथों में सिमट जाती है, तो वही वर्ग नीतियों, मीडिया, उपभोग की सामग्री और सार्वजनिक विमर्श, नीति निर्माण की दिशा तय करने लगता है। लोग क्या पहनेंगे, क्या खाएँगे, कैसे जीवन जिएंगे यह सब यही वर्ग तय करता है। इस व्यवस्था की जड़ें उस ऐतिहासिक सामाजिक सोच में भी मिलती हैं जो समाज को बराबरी के आधार पर नहीं बल्कि ऊँच-नीच, जातिगत वर्चस्व और सामाजिक पदानुक्रम के पैमाने पर बाँटती रही है। आर्थिक असमानता जब सामाजिक विषमता के साथ मिलती है, तो वह और अधिक गहरी हो जाती है। परिणामस्वरूप गरीबी केवल संसाधनों की कमी नहीं रहती, बल्कि सत्ता अपनी ताकत और छल कपट से इसको विस्तार देती है। 

गरीबी को समझने के लिए सामान्यतः तीन अवधारणाओं की चर्चा की जाती है- निरपेक्ष गरीबी, सापेक्ष गरीबी और आत्मिक गरीबी। निरपेक्ष गरीबी वह स्थिति है जहाँ भोजन, आवास, स्वास्थ्य और जीवन की बुनियादी आवश्यकताएँ ही पूरी नहीं हो पातीं। सापेक्ष गरीबी का संबंध उस स्थिति से है, जहाँ व्यक्ति या समुदाय समाज के औसत जीवन स्तर से बहुत नीचे जीवन जीने को मजबूर होता है। लेकिन एक तीसरी और अधिक गंभीर स्थिति है, आत्मिक या आंतरिक गरीबी, जहाँ समाज मानवीय संवेदना, सामाजिक दायित्व और सामूहिक संघर्ष की चेतना से दूर होता जाता है।

सरकारी और सांख्यिकीय विमर्श अकसर पहले दो स्तरों तक ही सीमित रहता है। यह गिना जाता है कि कितने लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं और कितनों ने उसे पार कर लिया है। भारत के बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार 2015–16 से 2019–21 के बीच लगभग 13.5 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए और आज लगभग 15 प्रतिशत आबादी बहुआयामी रूप से गरीब मानी जाती है। लेकिन इन आँकड़ों के बावजूद असमानता की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। इससे स्पष्ट होता है कि केवल गरीबी रेखा के ऊपर-नीचे की गणना से समस्या का समाधान संभव नहीं है।

आत्मिक गरीबी की अवधारणा इस स्थिति की ओर संकेत करती है, जब व्यक्ति या समाज यह पूछने की शक्ति खो देता है कि असमानता क्यों है। वह व्यवस्था पर प्रश्न उठाने के बजाय उसी असमान सीढ़ी पर ऊपर चढ़ने का सपना देखने लगता है। यह मानसिकता पूँजीवादी व्यवस्था को वैधता और स्थिरता देती है, क्योंकि लोग असमानता के ढाँचे को चुनौती देने के बजाय उसी के भीतर अपनी जगह तलाशने लगते हैं।

धीरे-धीरे व्यक्ति श्रम की गरिमा, सामाजिक न्याय और सामुदायिक हित जैसे मूल्यों से दूर होने लगता है। उसकी जगह उपभोग, संग्रह और दिखावटी समृद्धि की प्रवृत्ति ले लेती है। विज्ञापन, सोशल मीडिया और बाजारवादी संस्कृति मिलकर ऐसी इच्छाएँ पैदा करते हैं। यह आम इंसान की आय से कहीं अधिक होती है, लेकिन वह इन्हीं मानकों के आधार पर अपनी सफलता या विफलता को मापने लगता है।

इस प्रक्रिया में संवेदनशील नागरिक का रूपांतरण एक उपभोगवादी व्यक्ति में होने लगता है। वह अपने अधिकारों, श्रम-सम्मान और सामाजिक न्याय के प्रश्नों की जगह ऑफ़र, छूट और राहत योजनाओं को ही जीवन की मुख्य चिंता मानने लगता है। व्यवस्था से सवाल पूछने के बजाय वह उसी व्यवस्था से कुछ लाभ पाने की उम्मीद से कतारों में खड़ा रहना कबूल कर लेता है। यही वह आत्मिक दरिद्रता है जो अन्याय के खिलाफ खड़े होने की शक्ति को धीरे-धीरे कमजोर कर देती है।

दरहक़ीक़त, भारत में गरीबी का बने रहना केवल आर्थिक विफलता का परिणाम नहीं है; यह एक गहरी राजनीतिक वास्तविकता है। स्वतंत्रता के सात से अधिक दशकों बाद भी जब करोड़ों लोग गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन से वंचित हैं, तो यह केवल प्रशासनिक अक्षमता का प्रश्न नहीं, बल्कि उस राजनीतिक इच्छा-शक्ति की अनुपस्थिति का संकेत भी है जो असमानता को जड़ से चुनौती दे सके।

बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 19 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में लगभग 5 प्रतिशत आबादी अभी भी बहुआयामी गरीबी का सामना कर रही है। यह ग्रामीण-शहरी अंतर जाति, वर्ग और लिंग आधारित विषमताओं के साथ मिलकर एक जटिल सामाजिक-राजनीतिक संरचना विकसित करता है। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा अभाव और असुरक्षा में जीता है, तब उसे चुनावी नारों, राहत योजनाओं और अस्थायी सहायता के जरिए अपेक्षाकृत आसानी से बहलाया फुसलाया जा सकता है। इस तरह गरीबी कई बार राजनीति का सुविधाजनक औजार बन जाती है, न कि वास्तव में हल की जाने वाली समस्या।

स्वतंत्रता के समय भारत ने एक ऐसे राष्ट्र का सपना देखा था जो शिक्षित, समतामूलक और समृद्ध होगा। लेकिन शुरुआती दशकों में सत्ता-संरचनाओं को स्थिर करने की प्रक्रिया में गरीबी, भूख, बेरोजगारी और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत प्रश्न लंबे समय तक घोषणाओं और भाषणों तक ही सीमित रहे। बाद के वर्षों में जनदबाव और आंदोलनों के कारण अनेक योजनाएँ बनीं—रोज़गार, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी नीतियाँ लागू हुईं—लेकिन योजनाएँ बन जाना और समाज की संरचना बदल जाना, दोनों अलग बातें हैं।

किसी भी देश का वास्तविक विकास महानगरों की चमक, ऊँची इमारतों या शेयर बाजार की ऊँचाई से नहीं मापा जाता। विकास की असली कसौटी यह है कि उस देश का सबसे कमजोर और वंचित नागरिक किस स्थिति में जी रहा है। जब तक विकास की प्रक्रिया के केंद्र में गाँव, किसान, मजदूर, दलित-आदिवासी, स्त्री और अन्य वंचित समुदाय नहीं होंगे, तब तक समृद्धि का कोई भी दावा बेमानी ही रहेगा।

शिक्षा इस परिवर्तन की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी हो सकती है। यदि शिक्षा को वास्तव में मुक्त, समान और सार्वभौमिक अधिकार के रूप में लागू किया जाए, तो वह समाज को भीतर से बदलने की शक्ति रखती है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक भी यह दिखाता है कि जिन क्षेत्रों में शिक्षा विशेषकर महिला शिक्षा में सुधार हुआ है, वहाँ गरीबी में अपेक्षाकृत तेज़ गिरावट दर्ज की गई है।

शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन मात्र नहीं है; यह आत्मसम्मान, नागरिक चेतना और सामाजिक परिवर्तन की कुंजी है। जब शिक्षा लोगों को यह समझने की क्षमता देती है कि असमानता स्वाभाविक नहीं बल्कि सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं का परिणाम है, तभी समाज आत्मिक दरिद्रता से बाहर निकलकर न्यायपूर्ण व्यवस्था की मांग करने में समर्थ होता है।

इसलिए गरीबी को केवल आर्थिक समस्या मान लेना एक गंभीर भूल है। वास्तविक चुनौती उस आक्रामक अमीरी की है जो संसाधनों और अवसरों को अपने भीतर समेटते हुए समाज को असमानता की गहरी खाई में धकेल रही है। जब तक समाज आत्मिक दरिद्रता से मुक्त नहीं होगा अर्थात जब तक लोग अन्याय को नियति मानने के बजाय उसकी संरचनात्मक जड़ों पर सवाल नहीं उठाएँगे तब तक गरीबी के खिलाफ हर संघर्ष अधूरा ही रहेगा। इतिहास गवाह है कि समाज में वास्तविक परिवर्तन तब आता है जब लोग अभाव के साथ समझौता करने के बजाय अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस जुटाते हैं।