@संपादकीय: विश्व रंगमंच दिवस, जिसकी शुरुआत 1961 में International Theatre Institute द्वारा की गई, जिसका उद्देश्य सिर्फ सांस्कृतिक उत्सव नहीं था बल्कि समाज के साथ संवाद स्थापित करना था। रंगमंच के जरिये प्रतिरोध, हक की आवाज और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूकता फैलाना था। दुनिया में संचार के बहुत सारे माध्यम हैं जिसमें मौखिक परंपरा, लेखन, प्रिंट, सिनेमा और आज की डिजिटल दुनिया लेकिन इन सबके बावजूद रंगमंच की विशेषता जीवंत उपस्थिति आज भी बरकरार है। रंगमंच की खासियत यही है कि कलाकार और दर्शक के बीच कोई दूरी नहीं होती। कलाकार कई बार दर्शकों के अनुसार उसी क्षण संवाद रचता है और उसका प्रभाव भी तत्काल शुरू हो जाता है। यही कारण है कि रंगमंच को सबसे प्रभावशाली और संवेदनशील माध्यम माना गया है।
रंगमंच केवल कला नहीं, बल्कि एक हथियार भी है। हर कलात्मक रचना के माध्यम से समाज जुड़ सकता है और यह सामाजिक या राजनीतिक संघर्ष में एक प्रभावी उपकरण के रूप में काम करता है। रंगमंच को सत्ता से अलग नहीं किया जा सकता। हर देश किसी न किसी रूप में रंगमंच का उपयोग करता है, ताकि वह अपनी सत्ता को बनाए रख सके। यदि कलाकार या निर्देशक राजनीतिक रूप से सजग नहीं है, तो रंगमंच का उपयोग सत्ता को स्थापित करने के लिए भी किया जा सकता है और आज के समय में यह स्थिति कहीं-न-कहीं दिखाई भी देती है। यदि रंगमंच या कोई भी कला समाज को नई दृष्टि नहीं देती तो उसका महत्व ही क्या रह जाता है?
रंगमंच ने केवल मनोरंजन नहीं किया, बल्कि राजनीति, सामाजिक और समसामयिक मुद्दों को अपनी केंद्रभूमि में रखा है। यह वह विधा रही है जिसने सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया, सत्ता से सवाल पूछे और जनता के भीतर अस्तित्व की चेतना जगाई। यही कारण है कि सत्ता के लिए रंगमंच हमेशा असहज रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो दिखाई देता है कि रंगमंच केवल कला नहीं, बल्कि प्रतिरोध का सशक्त माध्यम भी रहा है। कई देशों में इसे प्रतिबंधित किया गया, क्योंकि इसमें सत्ता के खिलाफ आवाज़ उठाने की क्षमता थी। रंगमंच सीधे जनता से जुड़ता है और उसे सोचने, प्रश्न करने तथा प्रतिरोध करने के लिए प्रेरित करता है। एक वक्त ऐसा भी था जब नाटकों के माध्यम से राजनीतिक विमर्श तय होते थे और सत्ता परिवर्तन तक की जमीन तैयार होती थी। यही कारण है कि कई शासकों ने इसे नियंत्रित करने या प्रतिबंधित करने का प्रयास किया।
भारत में रंगमंच की परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है चाहे वह लोकनाट्य हो, नाटक मंडलियाँ हों या नुक्कड़ नाटक हो या फिर नौटंकी ही क्यों न हो। आज़ादी से पहले जब सिनेमा या तो नहीं था या बहुत सीमित था, तब रंगमंच ही आम जनता तक पहुँचने का सबसे बड़ा माध्यम था। नाटकों के जरिए ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनजागरण किया गया। कलाकारों ने अपने अभिनय और संवादों के माध्यम से स्वतंत्रता, स्वाभिमान और विद्रोह की भावना को जन-जन तक पहुँचाया। इसका प्रभाव इतना व्यापक था कि अन्य मनोरंजन के साधन भी इसके सामने फीके पड़ जाते थे। इसी प्रभाव से डरकर अंग्रेज़ों ने रंगमंच पर प्रतिबंध और सेंसरशिप लागू की। कई नाटक बंद कर दिए गए, कलाकारों को रोका गया, लेकिन फिर भी रंगमंच की आवाज़ को पूरी तरह दबाया नहीं जा सका। विशेष रूप से स्ट्रीट थिएटर (नुक्कड़ नाटक) आज भी आम लोगों के बीच जाकर सीधे संवाद स्थापित करता है। सफदर हाशमी की हत्या इसका जिताजागता उदाहरण है (2 जनवरी 1989 को दिल्ली के पास साहिबाबाद में 'हल्ला बोल' नुक्कड़ नाटक के दौरान राजनीतिक गुंडों द्वारा हत्या कर दी गई थी) साथ ही 21वीं सदी में यदि रंगमंच से उत्पन्न प्रतिरोध का उदाहरण देखना हो, तो कोर्ट (मराठी फिल्म 2014) को देखा जा सकता है, जिसमें दिखाया गया है कि एक कलाकार को अपनी अभिव्यक्ति के कारण वर्षों तक जेल में रहना पड़ता है। यह इस बात को दर्शाता की वर्तमान में रंगमंच अपनी किस तरह से अभिव्यक्ति रखता है।

